हटा दो सब बाधाएं मेरे पथ की ,
मिटा दो आशंकाए सब मन की,
ज़माने को बदलने की शक्ति को समझो ...
कदम से कदम मिला कर चलने तो दो मुझको।
आज के समय में नारी की सामाजिक प्रतिष्ठा बदल चुकी है। अब वह रसोई तक सीमित नहीं रही , काम चाहे घर का हो या बहार का , नारी ने उसे ना सिर्फ कुशलता पूर्वक अपनाया बल्कि खुद को उस काम में साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है , फिर चाहे वो काम ऑफिस में फाइल सम्भालना हो ,या बॉर्डर पर बन्दूक , आज की नारी हर काय्र में सक्षम हैं। अगर एक और अपनी ख़ूबसूरती से अपनी पहचान बनती है तो दूसरी और पेट्रोल पंप पर काम करके अपना घर चलाना भी जानती है आज की नारी। एक ऐसी ही चलती फिरती मिसाल से मेरी मुलाकात के कुछ अंश मैं आज आपके साथ बाटना चाहूंगी।
अगर आपसे बोला जाए की अपने दिमाग में एक 24 साल की लड़की की छवि बनाइए तो कैसी छवि बनाएँगे आप? सलवार सूट या जीन्स में कॉलेज जाने वाली एक लड़की जिसके हाथ में कुछ किताबें और उसका फ़ोन है... कुछ ऐसा या इससे मिलता जुलता ही आया होगा आपके दिमाग में , चलिए आप अब अपनी टकसाली सोच को विराम दीजिए और मिलिए अनीता से। चौबीस वर्षीय ये लड़की ,मरदाना वेश में लखनऊ की सड़कों पर पिछले दस महीनो से अपना इ- रिक्शा चला रही हैं। जिस उम्र में लडकिा ज़्यादा से ज़्यादा एक बेटी और बहन होती है, उस उम्र में अनीता एक तीन साल की लड़की की माँ और बाप ,दोनों है।
आजमगढ़ की रहने वाली अनीता प्रजापति , एक साल पहले अपना घर , अपना पति ,सब कुछ छोड़ कर लखनऊ आई थी। ऐसा करने की वजह पूछने पर, वो बोली की उन्हें उनके पति के लक्षण पसंद नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने पति को तलाक देना बेहतर समझा। आप खुद बताइए क्या अपने अभी तक किसी पिछड़े समाज की लड़की को अपने और अपनी बेटी की भविष्य के लिए ऐसा कदम उठाते देखा हा? क्या अभी भी हम उस समाज को "पिछड़ा" ही कहेंगे ? खैर , अनीता बी.ए ग्रेजुएट है , और अपनी बेटी के भवियश को लेकर बहुत संबंध भी।हर माँ की तरह उनके भी अपनी बेटी को लेकर बहुत सपने और उम्मीदें है, उनका सपना अपनी बेटी को डॉक्टर बनाने का है। मैने उनसे पूछा , की आपको ये इ - रिक्शा चलने का विचार कहा से आया, तो वो हस्ते हुए बोली की उन्हें अपनी बेटी के लिए कुछ भी करना मंज़ूर है, उनका कहना था की वो कुछ ऐसा करना चाहती है जो अलग भी हो और जिससे उन्हें इतने पैसे भी मिल जाए जिससे वो अपने सपने को भी पूरा कर सके।
उनसे उनके रिक्शा चलाने के तुजुर्बे के बारे में पूछा तो वो बोली की शुरू शुरू में तो बाकि रिक्शे वाले उनका बहुत मज़ाक उड़ाते थे और सवार मिलने में भी बहुत मुश्किल होती थी पर धीरे धीरे उन्हें अब लोगो का सहयोंग मिलने लगा और अब वो दिन में सिर्फ ४ घण्टे रिक्शा चला कर हज़ार पंद्रह सौ रूपए कमा लेती हैं।
बात चीत खत्म होते होते मेने उनसे उनकी ज़िन्दगी पर राय मांगी , तो वो बोली, " कभी किसी भी आदमी या परेशानी से डरना मत , जो भी मुसीबत आए उससे लड़ते जाना बिना थके और बिना हार माने , सफलता ज़रूर मिलेगी"।
अनीता के जज़्बे को मेरा सलाम, इतनी मुसीबतों को इतनी कम उम्र में झेलने के बाद भी ,आगे बढ़ते रहने के उनके जिगर और हौसले को मेरा सलाम। अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी की " आँखों में मंज़िले थी, गिरे और सँभालते रहे.....आंधियो में क्या दम था , चिराग हवा में भी जलते रहे ..... "
मिटा दो आशंकाए सब मन की,
ज़माने को बदलने की शक्ति को समझो ...
कदम से कदम मिला कर चलने तो दो मुझको।
आज के समय में नारी की सामाजिक प्रतिष्ठा बदल चुकी है। अब वह रसोई तक सीमित नहीं रही , काम चाहे घर का हो या बहार का , नारी ने उसे ना सिर्फ कुशलता पूर्वक अपनाया बल्कि खुद को उस काम में साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है , फिर चाहे वो काम ऑफिस में फाइल सम्भालना हो ,या बॉर्डर पर बन्दूक , आज की नारी हर काय्र में सक्षम हैं। अगर एक और अपनी ख़ूबसूरती से अपनी पहचान बनती है तो दूसरी और पेट्रोल पंप पर काम करके अपना घर चलाना भी जानती है आज की नारी। एक ऐसी ही चलती फिरती मिसाल से मेरी मुलाकात के कुछ अंश मैं आज आपके साथ बाटना चाहूंगी।
अगर आपसे बोला जाए की अपने दिमाग में एक 24 साल की लड़की की छवि बनाइए तो कैसी छवि बनाएँगे आप? सलवार सूट या जीन्स में कॉलेज जाने वाली एक लड़की जिसके हाथ में कुछ किताबें और उसका फ़ोन है... कुछ ऐसा या इससे मिलता जुलता ही आया होगा आपके दिमाग में , चलिए आप अब अपनी टकसाली सोच को विराम दीजिए और मिलिए अनीता से। चौबीस वर्षीय ये लड़की ,मरदाना वेश में लखनऊ की सड़कों पर पिछले दस महीनो से अपना इ- रिक्शा चला रही हैं। जिस उम्र में लडकिा ज़्यादा से ज़्यादा एक बेटी और बहन होती है, उस उम्र में अनीता एक तीन साल की लड़की की माँ और बाप ,दोनों है।
आजमगढ़ की रहने वाली अनीता प्रजापति , एक साल पहले अपना घर , अपना पति ,सब कुछ छोड़ कर लखनऊ आई थी। ऐसा करने की वजह पूछने पर, वो बोली की उन्हें उनके पति के लक्षण पसंद नहीं थे इसलिए उन्होंने अपने पति को तलाक देना बेहतर समझा। आप खुद बताइए क्या अपने अभी तक किसी पिछड़े समाज की लड़की को अपने और अपनी बेटी की भविष्य के लिए ऐसा कदम उठाते देखा हा? क्या अभी भी हम उस समाज को "पिछड़ा" ही कहेंगे ? खैर , अनीता बी.ए ग्रेजुएट है , और अपनी बेटी के भवियश को लेकर बहुत संबंध भी।हर माँ की तरह उनके भी अपनी बेटी को लेकर बहुत सपने और उम्मीदें है, उनका सपना अपनी बेटी को डॉक्टर बनाने का है। मैने उनसे पूछा , की आपको ये इ - रिक्शा चलने का विचार कहा से आया, तो वो हस्ते हुए बोली की उन्हें अपनी बेटी के लिए कुछ भी करना मंज़ूर है, उनका कहना था की वो कुछ ऐसा करना चाहती है जो अलग भी हो और जिससे उन्हें इतने पैसे भी मिल जाए जिससे वो अपने सपने को भी पूरा कर सके।
उनसे उनके रिक्शा चलाने के तुजुर्बे के बारे में पूछा तो वो बोली की शुरू शुरू में तो बाकि रिक्शे वाले उनका बहुत मज़ाक उड़ाते थे और सवार मिलने में भी बहुत मुश्किल होती थी पर धीरे धीरे उन्हें अब लोगो का सहयोंग मिलने लगा और अब वो दिन में सिर्फ ४ घण्टे रिक्शा चला कर हज़ार पंद्रह सौ रूपए कमा लेती हैं।
बात चीत खत्म होते होते मेने उनसे उनकी ज़िन्दगी पर राय मांगी , तो वो बोली, " कभी किसी भी आदमी या परेशानी से डरना मत , जो भी मुसीबत आए उससे लड़ते जाना बिना थके और बिना हार माने , सफलता ज़रूर मिलेगी"।
अनीता के जज़्बे को मेरा सलाम, इतनी मुसीबतों को इतनी कम उम्र में झेलने के बाद भी ,आगे बढ़ते रहने के उनके जिगर और हौसले को मेरा सलाम। अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूंगी की " आँखों में मंज़िले थी, गिरे और सँभालते रहे.....आंधियो में क्या दम था , चिराग हवा में भी जलते रहे ..... "
धन्यवाद।
